” सागर मनातला “

सागर मनातला
नेहमीच अशांत ।
बसुन काठावर
गप्पा निवांत ।
येणारी लाट
नवा सिद्धांत ।
सरले शब्द
हरवला प्रशांत
Sanjay R.

चलो चले कही दुर
देख कुछ अब आते है।
कोइ तो हो कही
याद हमे करता होगा ।
अब तो गुजरा जमाना वो
देख उन्हे जब खो जाते थे ।
यादे उनकी भरी पडी है
देखो अब भी जान अडी है ।
लौटा देते कुछ उनकोभी
सासे अब भी रुकी पडी है ।
Sanjay R.

आहे का कुणाकडं थोडा वेळ ।
खेळु या सारे आपण एक शब्दांचा खेळ ।
जोडुन शब्दांना करु या शब्दांची भेळ ।
गोड आंबट होइल थोडी  मसाला स्मेल ।
बघु या काय होतं हा शब्दांचा खेळ ।
Sanjay R .

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